आज मैं श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय धनंजय वर्मा जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।
इनकी अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं।
आज प्रस्तुत है स्वर्गीय धनंजय वर्मा जी की यह कविता –

टे से कमरे में
एकरसता से
ऊब जब जाता हूँ
यहाँ की कुर्सी वहाँ
वहाँ का सामाँ यहाँ
रख लेता हूँ ।
इस पे भी जब
चैन नहीं मिलता
कैलेण्डर और तस्वीरें
बदल देता हूँ ।
दायरा हमारा
बहुत छोटा है बड़ा होता नहीं है
रहते हुए इसमें जब
हम सब ऊब जाते हैं
कुछ अदल-बदल देते हैं ।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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