किस तरह वो दिन भुलाऊँ जिस बुरे दिन का शरीक,
एक भी अपना नहीं था और बेगाने कई|
नज़ीर बनारसी
एक भी अपना नहीं था!
One response to “एक भी अपना नहीं था!”
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Bahut khoob🙏🏻
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A sky full of cotton beads like clouds
Bahut khoob🙏🏻
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