हम को तासीर-ए-ग़म से मरना है!

आज मैं श्रेष्ठ उर्दू शायर स्वर्गीय जिगर बरेलवी जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।

इनकी रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं।

आज प्रस्तुत है स्वर्गीय जिगर बरेलवी जी की यह ग़ज़ल –

हम को तासीर-ए-ग़म से मरना है
अब इसी रंग में निखरना है

ज़िंदगी क्या है सब्र करना है
ख़ून का घूँट पी के मरना है

जान-निसारी कुबुल हो के न हो
हम को अपनी सी कर गुज़रना है

मौज-ए-दरिया हैं हम हमारा क्या
कभी मिटना कभी उभरना है

सम्म-ए-क़ातिल ‘जिगर’ नहीं मिलता
दिल का क़िस्सा तमाम करना है


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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2 responses to “हम को तासीर-ए-ग़म से मरना है!”

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