क्या वह भी अरमान तुम्हारा!

आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय जानकीवल्लभ शास्त्री जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।

शास्त्री जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।

आज प्रस्तुत है स्वर्गीय जानकीवल्लभ शास्त्री जी का यह गीत-

क्या वह भी अरमान तुम्हारा?

जो मेरे नयनों के सपने,
जो मेरे प्राणों के अपने ,
दे-दे कर अभिशाप चले सब-
क्या यह भी वरदान तुम्हारा ?

खुली हवा में पर फैलाता,
मुक्त विहग नभ चढ़ कर गाता
पर जो जकड़ा द्वंद्व-बन्ध में,-
क्या वह भी निर्माण तुम्हारा?

बादल देख हृदय भर आया
‘दो दो-बूँद’ कहा, दुलराया;
पर पपीहरे ने जो पाया, –
क्या वह भी पाषाण तुम्हारा?

नीरव तम, निशीथ की बेला,
मरु पथ पर मैं खड़ा अकेला
सिसक-सिसक कर रोता है, जो –
क्या वह भी प्रिय गान तुम्हारा?

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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2 responses to “क्या वह भी अरमान तुम्हारा!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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