आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय चंद्रसेन विराट जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।
विराट जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।
आज प्रस्तुत है स्वर्गीय चंद्रसेन विराट जी का यह नवगीत-

किसी के स्पर्शों से मेरी
देह सब पाटल-पाटल है ।
प्राण में जली प्रणय की लौ
काम्य कौमार्य कपूर हुआ,
आरती श्वास, रोम अक्षत
लाज का स्वर सिन्दूर हुआ,
प्यार की पूजा के पल में
समर्पित तन-तुलसीदल है ।
प्रणय-पुष्पों की गंध लिए
साँस के सार्थवाह निकले,
गीत गंधर्वी आत्मा से
पूर्ण करके विवाह निकले,
वृत्ति अब जैसे वंशी है,
मर्म अब जैसे मादल है ।
देह की शिरा-शिरा गोपी
गूँजता मन-वृन्दावन है,
मग्न है महारास में सब
ब्रह्मसुख पाने का क्षण है ।
हृदय के श्याम व्यथाकुल हैं,
प्रीति की राधा विह्वल है ।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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