मेरा एक सपना यह भी!

आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय चंद्रकांत देवताले जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।

देवताले जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।

आज प्रस्तुत है स्वर्गीय चंद्रकांत देवताले जी की यह कविता-

सुख से पुलकने से नहीं
रबने-खटने के थकने से
सोई हुई है स्त्री,

मिलता जो सुख
वह जगती अभी तक भी
महकती अंधेरे में फूल की तरह
या सोती भी होती
तो होंठों पर या भौंहों में
तैरता-अटका होता
हँसी-खुशी का एक टुकड़ा बचाखुचा कोई,

पढ़ते-लिखते बीच में जब भी
नज़र पड़ती उस पर कभी
देख उसे खुश जैसा बिन कुछ सोचे
हँसता बिन आवाज़ मैं भी,

नींद में हँसते देखना उसे
मेरा एक सपना यह भी
पर वह तो
माथे की सलवटें तक
नहीं मिटा पाती सोकर भी

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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One response to “मेरा एक सपना यह भी!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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