चर्चा बादलों पर!

प्रस्तुत है आज का यह गीत, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

आया है बारिश का मौसम
करो चर्चा बादलों पर।

दोष दो या दो दुआएं
कुछ असर इन पर न होगा
श्रमिक हैं ये तो प्रकृति के
करें जो आदेश होगा,

ले कभी जल भार चलते
या कभी रीते कनस्तर।

रूई के फाहे सरीखे
कभी दिखते श्वेत कोमल
अथक श्रम, अविरल तपन से
कालिमा में हैं गए ढल

बहुत करने काम पूरे
हैं सदा इस हेतु तत्पर।

देख इनका कार्य कौशल
कभी चाहे चकित हो लें।
या कभी यूं ही चले जाने पे
कुछ कटु बोल बोलें,

क्या सफाई मेघ दें ,
आदेश की है पालना भर।

प्राप्त
हैं निर्देश सब
पानी कहां से है उठाना
कहां तक ढोना उसे
किस तरह से फिर है गिराना,

सिर्फ इतना ध्येय बस
हो जाएं ये काम समय पर।

निपट अंगूठा छाप
चूक भी हो ही जाती है
चूके तो फिर प्रकृति इन्हें
कितना दौड़ाती है,

कभी-कभी फट भी जाते
ये गुस्से में भरकर।

साथ साथ इनका मुखिया
चलता है ले बिजली का हंटर
कोप इन्हें सहना होता है
अपनी किंचित हुई चूक पर

लेकिन ये प्रकोप उसका
पड़ जाता कभी-कभी धरती पर।

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार।

                    *****

One response to “चर्चा बादलों पर!”

  1. वाह! बादलों को श्रमिकों की तरह देखना कितना अनोखा और खूबसूरत विचार है। ☁️🌧️ उनकी मेहनत, मजबूरी, डाँट और कभी-कभी गुस्से में फट पड़ने तक को आपने कितनी सहजता और कल्पनाशीलता से पिरोया है। 🤍

    सबसे प्यारी बात यही लगी कि बारिश की बूंदों के पीछे भी आपने एक पूरी “ड्यूटी” और कहानी देख ली। बहुत सुंदर रचना! 👏🌧️☁️🦋✨

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