सोचकर वादी-ए-उल्फ़त!

सोच कर वादी-ए-उल्फ़त में क़दम रख ‘साहिर’,
सिर्फ़ दिल ही का ज़ियाँ हो ये ज़रूरी तो नहीं|

साहिर होशियारपुरी

2 responses to “सोचकर वादी-ए-उल्फ़त!”

  1. क्या खूब कहा है,,,,,इश्क़ की वादी में कदम रखना सिर्फ़ दिल हारने का ख़तरा नहीं, कभी-कभी पूरी ज़िंदगी की दिशा बदल जाने का सबब भी बन जाता है।

    मोहब्बत में ज़ियाँ सिर्फ़ दिल का नहीं होता साहिर साहब, कभी-कभी आदमी ख़ुद से भी हाथ धो बैठता है… और यही इश्क़ की सबसे ख़ामोश कीमत है। 🌹

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    1. बहुत सुंदर व्याख्या जी, धन्यवाद.

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