स्पर्श!

आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय कैलाश वाजपेयी जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।

वाजपेयी जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।

आज प्रस्तुत हैं स्वर्गीय कैलाश वाजपेयी जी की यह कविता-

एक भूखा समुद्र था
हर क्षण गरजता
पछाड़ें खाता हुआ
कहते हैं कभी एक भूखा समुद्र था
बड़ी-बड़ी नदियों को चूसकर (पैरों से)
फेंकता था क्रुद्ध हो
खारे जल की पहाड़ियाँ
रेत और स्वादहीन फेन के
कटीले झंखार |
यों हुआ कि एक दिन धरती को तोड़कर
एक बहुत दुबली-सी चंदन धुली हुई
अलसायी धार

आकर समुद्र की बाँहों में सो गई।
धारा तो खो गई
पर उस समुद्र की
बूँद-बूँद शहदीली हो गई
कहते हैं कभी एक भूखा समुद्र था।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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