खोल दूं यह आज का दिन!

आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय केदारनाथ सिंह जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।

इनकी बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।

आज प्रस्तुत हैं स्वर्गीय केदारनाथ सिंह जी की यह कविता-

खोल दूं यह आज का दिन
जिसे-
मेरी देहरी के पास कोई रख गया है,
एक हल्दी-रंगे
ताजे
दूर देशी पत्र-सा।
थरथराती रोशनी में,
हर संदेशे की तरह
यह एक भटका संदेश भी
अनपढा ही रह न जाए-
सोचता हूँ
खोल दूं।
इस सम्पुटित दिन के सुनहले पत्र-को
जो द्वार पर गुमसुम पडा है,
खोल दूं।

पर, एक नन्हा-सा
किलकता प्रश्न आकर
हाथ मेरा थाम लेता है,
कौन जाने क्या लिखा हो?
(कौन जाने अंधेरे में- दूसरे का पत्र मेरे द्वारा कोई रख गया हो)
कहीं तो लिखा नहीं है
नाम मेरा,
पता मेरा,
आह! कैसे खोल दूं।

हाथ,
जिसने द्वार खोला,
क्षितिज खोले
दिशाएं खोलीं,
न जाने क्यों इस महकते
मूक, हल्दी-रंगे, ताजे,
किरण-मुद्रित संदेशे को
खोलने में कांपता है।


आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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3 responses to “खोल दूं यह आज का दिन!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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