पर इक सुकून था!

समझ लिया था कभी इक सराब को दरिया,
पर इक सुकून था हम को फ़रेब खाने में|

जावेद अख़्तर

2 responses to “पर इक सुकून था!”

  1. “समझ लिया था कभी इक सराब को दरिया, / पर इक सुकून था हम को फ़रेब खाने में…”

    वाह… क्या गहरी बात कह दी है। जीवन में कई बार हम जिसे सच मानकर थाम लेते हैं, वह बाद में मृगतृष्णा निकलता है; फिर भी उस भ्रम में बिताए गए कुछ पल झूठे नहीं लगते। क्योंकि हर फ़रेब केवल धोखा नहीं होता कभी-कभी वह दिल की एक मासूम ज़रूरत भी होता है। यह शेर उसी मीठी ख़ुदफ़रेबी का बयान है, जहाँ इंसान सच जान लेने के बाद भी उन लम्हों से नफ़रत नहीं कर पाता जिन्होंने कभी उसे जीने का सहारा दिया था। बहुत नफ़ीस, बहुत दर्दभरा और देर तक मन में उतरने वाला शेर।

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