धीरे धीरे पिघल रही है!

जो मुझ को ज़िंदा जला रहे हैं वो बे-ख़बर हैं,
कि मेरी ज़ंजीर धीरे धीरे पिघल रही है|

जावेद अख़्तर

2 responses to “धीरे धीरे पिघल रही है!”

  1. Behad khoobsurat 🦋✨

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    1. हार्दिक आभार जी

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