आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि एवं राजनेता श्री उदयप्रताप सिंह जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।
उदयप्रताप जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।
आज प्रस्तुत हैं श्री उदयप्रताप सिंह जी की यह ग़ज़ल-

ना तीर न तलवार से मरती है सचाई
जितना दबाओ उतना उभरती है सचाई
ऊँची उड़ान भर भी ले कुछ देर को फ़रेब
आख़िर में उसके पंख कतरती है सचाई
बनता है लोह जिस तरह फ़ौलाद उस तरह
शोलों के बीच में से गुज़रती है सचाई
सर पर उसे बैठाते हैं जन्नत के फ़रिश्ते
ऊपर से जिसके दिल में उतरती है सचाई
जो धूल में मिल जाय, वज़ाहिर, तो इक रोज़
बाग़े-बहार बन के सँवरती है सचाई
रावण की बुद्धि,बल से न जो काम हो सके
वो राम की मुस्कान से करती है सचाई
आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********
Leave a comment