आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।
मालवीय जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।
आज प्रस्तुत हैं स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी का यह नवगीत-

दिन भले ही
बीत जाएँ क्वार के
पर नहीं बीते अभी दिन ज्वार के
अभी मैं सागर
अभी तुम चंद्रमा हो
बिछ गई, मेरी लहर पर
चंदरिमा हो
अभी तो हैं सिलसिले त्यौहार के
रातरानी और हरसिंगार के
अभी तो घर बार
घर की सौ नियामत
अभी सीता की रसोई
है सलामत
अभी सारे दिन लगें इतवार के
फुर्सतों के, चुहल के तकरार के
अभी है सम्बन्ध में
ख़ासी हरारत
छेड़खानी, चुटकियाँ
मीठी शरारत
अभी पत्ते हरे वन्दनवार के
परिजनों के भेंट भर अकवार के
आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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