बहुत सी बार किसी कठिन विषय को छूने का मन होता है, आज का विषय भी ऐसा ही है।
शिक्षा व्यवस्था में, प्रतियोगी परीक्षाओं की शुचिता, त्रुटिहीनता की व्यवस्था की मांग करना बहुत सही है, लेकिन क्या इस आंदोलन की, इस आमरण अनशन की दिशा और मंशा सही है?
इससे पहले अन्ना हजारे जी का आमरण अनशन हमने देखा था, तब लोकपाल बिल लाने की बात थी, अन्ना हजारे जी की एक ईमानदार और देशभक्त व्यक्ति की छवि थी जिसका इस्तेमाल अरविंद केजरीवाल नाम के एक चालाक व्यक्ति ने किया, वो यह भी कहता रहा कि उसे राजनीति में नहीं आना है, वह राजनीति में आया और उसने वे सब काम किए जिनके बारे में उसने कहा था कि वह नहीं करेगा। बाद में जब उसने दिल्ली में सरकार बनाई तब लोकपाल बनाने की जिस मांग को लेकर आंदोलन हुआ था उसने अपने लोकपाल को ही बर्खास्त कर दिया और फिर दोबारा नहीं बनाया।
अन्ना हजारे जी के अनशन के समय मांग एक ऐसी व्यवस्था की थी जिससे माना जाता था कि उसके कारण व्यवस्था में बहुत सुधार आएगा, पारदर्शिता आएगी आदि, वह आंदोलन किसी व्यक्ति का इस्तीफा मांगने के लिए नहीं था। आखिर अपना उद्देश्य इन लोगों ने कितना छोटा कर लिया है।
अन्ना आंदोलन के समय जनता के बीच व्यापक असंतोष था, आज यह असंतोष जनता के बीच नहीं अपितु कुछ खास विचारधारा वाले बुद्धिजीवियों के बीच अधिक है। ऐसा आंदोलन करने वाले शायद यह भूल जाते हैं कि परीक्षा के पेपर लीक होना आज शुरू नहीं हुआ है, यह लगातार चला आ रहा है, बल्कि हाल ही में इसमे सुधार के लिए कुछ कदम उठाए गए हैं, यद्यपि वे नाकाफी रहे हैं. हमारे लोगों की नस-नस में भरे लालच को मिटाने के लिए कुछ अधिक प्रभावी कदम उठाए जाने की आवश्यकता है, आशा करनी चाहिए कि हम आगे चलकर इसमें सफल हो पाएंगे, लेकिन इन सब कमियों के लिए शिक्षा मंत्री को कैसे ज़िम्मेदार बनाया जा सकता है, यह भी कोई नहीं बता पा रहा है।
लोगों को शायद यह याद न हो कि मोदी सरकार बनने के बाद भी अन्ना हजारे जी ने रामलीला मैदान में आमरण अनशन प्रारंभ किया था, जिसको जन-समर्थन नहीं मिल पाया था और उनको किसी तरह अपना वह अनशन समाप्त करना पड़ा था।
इस आंदोलन के बारे में यह भी उल्लेखनीय है कि इसका जन्म विदेश में सोशल मीडिया के माध्यम से हुआ, ऐसे अनेक लोग इसके साथ जुड़े जो हमेशा देश के खिलाफ बोलते हैं, कुछ विदेशी मीडिया इसको हवा देने के लिए आगे आ रहा है, देशी मीडिया को तो ये लोग वैसे ही गाली देते हैं। एक जेएनयू का ढपली गैंग है जो ऐसे अवसरों की तलाश में हमेशा लालायित रहता है, बाकी जन समर्थन इस आंदोलन को नहीं मिल पा रहा है क्योंकि इनका लक्ष्य ही स्पष्ट नही है। धर्मेंद्र प्रधान ने यूजीसी के संबंध में जो निर्णय लिया था वो सबको बुरा लगा था लेकिन वह इनकी मांगों में शामिल नहीं हो सकता, क्योंकि इनको जातीय संतुलन भी साधना है।
पेपर लीक के बाद कुछ छात्र आत्महत्या कर लेते हैं, जो अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है, इसके लिए आप मंत्री को ज़िम्मेदार मान सकते हैं यदि आप यह सिद्ध कर सकें कि पेपर लीक में उसकी भूमिका है। हमारे लोगों की नस-नस में फैले भ्रष्टाचार से निपटने के लिए और अधिक कठोर कदम उठाए जाने की आवश्यकता है और लगता है कि कुछ उठाए भी गए हैं, इस मामले में सभी दल मिलकर कोई नीति प्रस्तावित करें तो अच्छा होगा, विदेशों से प्रायोजित इस प्रकार के अभियान जो हमारे कुछ पडौसी देशों में तख्ता पलट करने में सफल भी हो गए हैं उनकी कोई आवश्यकता नहीं है।
श्री सोनम वांगचुक का जीवन भी उसी प्रकार अमूल्य है जैसे किसी भी भारतीय का है और उनको निरर्थक ज़िद के लिए अपना जीवन दांव पर नहीं लगाना चाहिए।
मुझे लगा कि इस विषय में मैं अपना कुछ अलग मत रख दूं, वैसे तो आंदोलनधर्मियों के अलावा कोई और इस विषय में बात ही नहीं कर रहा है क्योंकि सोशल मीडिया पर ऐसा विचार रखने पर ये शूरवीर सीधे गालियों पर उतर आते हैं।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
*****
Leave a comment