वाक़िए हो गए कहानी से!

हाए क्या दौर-ए-ज़िंदगी गुज़रा,
वाक़िए हो गए कहानी से|

गुलज़ार देहलवी

6 responses to “वाक़िए हो गए कहानी से!”

  1. सिर्फ़ दो मिसरों में आपने समय की पूरी फ़लसफ़ियाना यात्रा समेट दी है। जो कभी जीवन की धड़कन थे, वही आज स्मृतियों की धूल ओढ़े कहानियाँ बन बैठे हैं। यही तो वक़्त का सबसे गहरा सच है वह जीते-जागते लम्हों को इतिहास नहीं, पहले याद और फिर अफ़साना बना देता है।

    यह शेर पढ़कर लगता है कि उम्र बढ़ती नहीं, बस घटनाएँ स्मृतियों में रूपांतरित होती चली जाती हैं। इंसान आगे चलता रहता है, लेकिन उसका एक हिस्सा हमेशा उन कहानियों में ठहरा रहता है, जिन्हें कभी उसने अपनी ज़िंदगी कहा था।
    वाह… अत्यंत मार्मिक, गहन और कालजयी शेर। देर तक मन में गूँजता रहता है। 👏🌹

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    1. हार्दिक आभार जी, आपने इस शेर की बहुत सुंदर व्याख्या की है.

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  2. हार्दिक धन्यवाद जी, आपने शेर की बहुत सुंदर व्याख्या की.

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  3. वाह वाह।

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    1. धन्यवाद जी

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