आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि श्री अशोक वाजपेयी जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ। इसी शीर्षक से उनकी दो कविताएं हैं पहली यहाँ प्रस्तुत है।
वाजपेयी जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।
आज प्रस्तुत हैं श्री अशोक वाजपेयी जी की यह कविता –

अन्त के बाद
हम चुपचाप नहीं बैठेंगे।
फिर झगड़ेंगे,
फिर खोजेंगे,
फिर सीमा लाँघेंगे
क्षिति जल पावक
गगन समीर से
फिर कहेंगे-
चलो
हमको रूप दो,
आकार दो !
वही जो पहले था
वही-
जिसके बारे में
अन्त को भ्रम है
कि उसने सदा के लिए मिटा दिया।
अन्त के बाद
हम समाप्त नहीं होंगे-
यहीं जीवन के आसपास
मँडरायेंगे-
यहीं खिलेंगे गन्ध बनकर,
बहेंगे हवा बनकर,
छायेंगे स्मृति बनकर।
अन्तत:
हम अन्त को बहकाकर
फिर यहीं आयेंगे-
अन्त के बाद
हम चुपचाप नहीं बैठेंगे।
आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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