प्रस्तुत है आज का यह गीत, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

ऊपर वाला मेरे पत्ते
रोज बदल देता है.
उसे बहुत भाता है शायद
खेल खेलना मुझसे
इतने सखा भाव से आखिर
और मिले वो किससे
किंतु सुना था वो बस
करनी का फल देता है.
मेरे साथ खेल की तुमने
क्यों सोची भगवन
देवलोक में कहीं आप क्या
कर बैठे क्या अनबन
खैर प्रेम में जो भी हारे
वही विजेता है.
मैंने कभी प्रेम में है
तलवार नहीं भांजी
शांत भाव से हार चुका हूं
कितनी ही बाज़ी
मुझसे छल काहे करता
युग युग का जेता है.
मेरा ईश प्रसन्न रहे
यह भी मेरी जय है
उसके न्याय कर्म में मुझको
तनिक न संशय है
मेरी सभी चेष्टाओं का
वही प्रणेता है.
आएंगे जायेंगे मौसम
सब ऐसे-वैसे
हम स्वीकार करेंगे उनको
जैसे हैं वैसे
बाकी वो जाने जो सदा
परीक्षा लेता है.
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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