मेरे दरवाज़े से अब चाँद को!

आज मैं श्रेष्ठ उर्दू शायर अली सरदार जाफ़री जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।

इनके बहुत से शेर मैंने पहले शेयर किए हैं।

आज प्रस्तुत हैं स्वर्गीय अली सरदार जाफ़री जी की यह नज़्म –

मेरे दरवाज़े से अब चाँद को रुख़सत कर दो
साथ आया है तुम्हारे जो तुम्हारे घर से
अपने माथे से हटा दो ये चमकता हुआ ताज
फेंक दो जिस्म से किरणों का सुनहरी ज़ेवर
तुम्ही तन्हा मेरे ग़म-खाने में आ सकती हो
एक मुद्दत से तुम्हारे ही लिए रखा है
मेरे जलते हुए सीने का दहकता हुआ चाँद


आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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2 responses to “मेरे दरवाज़े से अब चाँद को!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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