बिखरे हैं पर!


आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय हरीश निगम जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।

निगम जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।

आज प्रस्तुत हैं स्वर्गीय हरीश निगम जी का यह नवगीत-

खाली पिंजरा
डोल रहा
ओसारे में!

चला गया
सुगना
बिखरे हैं पर
टीसों के
मौसम से
गए ठहर
फ़र्क न लगता
शाम-सुबह
अंधियारे में!

फेरे हैं
दिन-भर
परछाईं के

आए ना
झोंके
पुरवाई के
टोना-सा है
अमलतास
कचनारों में!

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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2 responses to “बिखरे हैं पर!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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