मृत्यु – अक्षांशों तक!

आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि श्री सोम ठाकुर जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।

सोम जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।

आज प्रस्तुत हैं श्री सोम ठाकुर जी का यह गीत-

उफ़ने ज्वालामुखी मृत्यु – अक्षांशों तक
गूंगी -नंगी सदी नहाई लावे में

गर्म आँधियाँ बिंधने लगी हरे वन में
लपटों के झरने झरते, उबली नदियाँ
लाल -बैंज़नी दाहों के बीच भुनी नज़रें
पंख खोलते हुए मर गयी जलपरियाँ
हाड़ -माँस के ढेर लगे हैं मोडों पर
चील -गिद्ध हैं अपने – अपने दावे में

चीख लिए लौटे भूकंप दिशाओं से
पर्तों -दबा गुँथी बाहों में कसा गगन
चौंकी बस्ती, बहके शहरों – गावों को
फिर निचोड़ देगी चट्टानों की ऐंठन
अंगारे, धंसती धरती, गंधकी धुआँ
भेद बहुत है मौसम के बर्ताव में

अभिशापित ऊर्जा -दैत्यों की होड़ यहाँ
शिलालेख लिख देगी नये अमंगल के
अंकित कर दन्शित उभार की नीचाई
हम साँचे बन जाएँगे बीते कल के
वक्त हमें ‘फाँसिल’ कर देगा, कौन यहाँ
आए श्वेत कपोतों के बहकावों में
गूंगी नदी सदी नहाई – लावे में


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********



5 responses to “मृत्यु – अक्षांशों तक!”

  1. बहुत सुंदर।

    Liked by 1 person

    1. हार्दिक धन्यवाद जी

      Liked by 1 person

  2. नागेश्वर

    Liked by 1 person

    1. क्षमा कीजिए,,नमस्कार लिख रहा था,,अपना नाम ही कमेंट में छप गया 🙏🏻 नमस्कार 🙏🏻

      Liked by 1 person

      1. कोई बात नहीं जी

        Like

Leave a comment