आज मैं प्रसिद्ध शायर तथा फिल्मी गीतकार साहिर लुधियानवी जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।
साहिर जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।
आज प्रस्तुत हैं साहिर लुधियानवी जी की यह ग़ज़ल-

भड़का रहे हैं आग लब-ए-नग़्मगर से हम ।
ख़ामोश क्यों रहेंगे ज़माने के डर से हम ।
ले दे के अपने पास फ़क़त इक नज़र तो है,
क्यों देखें ज़िन्दगी को किसी की नज़र से हम ।
कुछ और बड़ गए अन्धेरे तो क्या हुआ,
मायूस तो नहीं हैं तुलु-ए-सहर से हम ।
देगा किसी मक़ाम पे ख़ुद राहज़न का साथ,
ऐसे भी बदगुमान न थे राहबर से हम ।
माना कि इस ज़मीं को न गुलज़ार कर सके
कुछ ख़ार कम तो कर गए गुज़रे जिधर से हम ।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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