कंठ अतीव सुरीला है!

प्रस्तुत है आज की यह रचना, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

मन तो उनका सुनते हैं जहरीला है
लेकिन फिर भी कंठ अतीव सुरीला है।

दूर हो गए हैं हम कितने खुद से भी
अपनों के अपनेपन की यह लीला है।

इतने गहरे रंग भरे हैं दुनिया में
आसमान फिर भी क्यों हल्का नीला है।

जितने ऊंचे उपदेशक देखे हमने
बहुधा ही उनका कैरेक्टर ढीला है।

धन-दौलत, ऐश्वर्य भार से दबा हुआ
लेकिन संग्रह को अब भी फुर्तीला है।

मेरे कहने से यह कभी न बदलेगा
मेरा अपना कहन विशेष हठीला है।

बहुत सरल राहें हैं मीठे सपनों की
मार्ग सर्जना का लेकिन पथरीला है।

आस लगाए बैठे हैं भूखे बच्चे
रखा आंच पर पानी भरा पतीला है।


आज के लिए इतना ही,
धन्यवाद।
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