कड़वा सत्य!

आज मैं श्रेष्ठ हिंदी साहित्यकार स्वर्गीय विष्णु प्रभाकर जी की रचना शेयर कर रहा हूँ।

विष्णु प्रभाकर जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।

आज प्रस्तुत हैं स्वर्गीय विष्णु प्रभाकर जी की यह कविता –

एक लंबी मेज
दूसरी लंबी मेज
तीसरी लंबी मेज
दीवारों से सटी पारदर्शी शीशेवाली अलमारियाँ
मेजों के दोनों ओर बैठे हैं व्यक्ति
पुरुष-स्त्रियाँ
युवक-युवतियाँ
बूढ़े-बूढ़ियाँ
सब प्रसन्न हैं

कम-से-कम अभिनय उनका इंगित करता है यही
पर मैं चिंतित हूँ
देखकर उस वृद्धा को
जो कभी प्रतिमा थी लावण्य की
जो कभी तड़प थी पूर्व राग की
क्या ये सब युवतियाँ
जो जीवन उँड़ेल रही हैं
युवक हृदयों में
क्या ये सब भी
बूढ़ी हो जाएँगी
देखता हूँ पारदर्शी शीशे में
इस इंद्रजाल को
सोचता हूँ—
सत्य सचमुच कड़वा होता है।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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4 responses to “कड़वा सत्य!”

  1. बहुत ही खूबसूरत 🙏🏻

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    1. हार्दिक आभार जी

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  2. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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