यार हमें मत बांटो ज्ञान!

प्रस्तुत है मेरी आज की रचना, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

यार हमें मत बांटो ज्ञान
तुम बेचो अपना सामान।

नहीं चाहिए लफ्फाजी
मेरा बल मेरा ईमान।

नियम कायदे विनिमय के
क्या जानेंगे हम नादान।

आंसू एकत्रित करके
बनता ग़ालिब का दीवान।

संवेदन की दुनिया में
बरछी, भाले और कृपाण!

ढोल, नगाड़े सब बाहर
मन की यह बस्ती सुनसान!

पहना डाले अंबर को,
संध्या ने क्या-क्या परिधान!

सदा चलाते रहते तुम
अपनों पर कविता के बाण!

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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