वफ़ा, ख़ुलूस ओ मोहब्बत!

वफ़ा, ख़ुलूस ओ मोहब्बत को फिर समझना है,
कहाँ लिखे हैं ये अल्फ़ाज़ तू किताब तो दे|

क़ैसर ख़ालिद

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