गिरफ़्तार हुआ करते थे!

इक नज़र रोज़ कहीं जाल बिछाए रखती,
और हम रोज़ गिरफ़्तार हुआ करते थे|

सलीम कौसर

2 responses to “गिरफ़्तार हुआ करते थे!”

  1. वाह वाह।

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    1. हार्दिक धन्यवाद जी

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