खुला रहने दो!

आज मैं श्रेष्ठ हिंदी साहित्यकार एवं कवि स्वर्गीय रांगेय राघव जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।
रांगेय राघव जी की अधिक रचनाएं मैंने शायद पहले शेयर नहीं की हैं।
आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रांगेय राघव जी की यह कविता –

गगन निविड़ घाटी
मुझे मिली भूमि
सघन माटी;
उगी कली बंद,
जीवन का छंद
रस-लहरी साकार,
गंध निराधार,
बहता है
अनदेखा समीर,
काल-कुहर स्पर्श,
पर अधीर,
खुलो अब पंखुरी,
रागिणी मृदु-सुरी,
माधुरी !!
सब कुछ खो जाए,
मेरे पास रह जाए—
दूब पर झलकती
ललकती
ओस-सी
रूप की धुरी !!

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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2 responses to “खुला रहने दो!”

  1. बहुत सुंदर।

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    1. हार्दिक धन्यवाद जी

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