आज काफी समय बाद मेरी एक रचना हल्के-फुल्के मूड में प्रस्तुत है-

अब घर के कोने में
जा बैठा है यह बबुआ
जिसे प्यार से हम सब
टेडी बीयर कहते थे।
अब वह प्यार नहीं
इसके हिस्से में आता है
जो कुछ होता उसको बस
तकता रह जाता है,
एक समय था जब यह भी
बिस्तर पर सोता था,
इसकी खातिर शिशु के कर
लालायित रहते थे।
याद नहीं है जन्म दिवस
या कब घर आया था,
घर में जब छोटा शिशु था
उसको यह भाया था,
धीरे धीरे अनस्तित्व को
यह भी प्राप्त हुआ
भूल गए जो भी इसकी
सेवा में रहते थे।
साथ हमारे बदले हैं
इसने भी कई मकान
लदा ट्रकों में यह भी
जब-जब लदा साज-सामान,
नहीं एक से दिन रहते
सब सच ही कहते हैं
कहाँ देखते हैं पल भर
जो तकते रहते थे।
आज के लिए इतना ही, धन्यवाद।
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