ग़म-ए-दिल रुख़ से!

ग़म-ए-दिल रुख़ से अयाँ हो ये ज़रूरी तो नहीं,

इश्क़ रुस्वा-ए-जहाँ हो ये ज़रूरी तो नहीं|

साहिर होशियारपुरी

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