अब ख़ून को मय!

आज मैं श्रेष्ठ शायर स्वर्गीय मलिकज़ादा मंजूर जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।

इनकी रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं।

आज प्रस्तुत है स्वर्गीय मलिकज़ादा मंजूर जी की यह ग़ज़ल –

अब ख़ून को मय क़ल्ब को पैमाना कहा जाए
इस दौर में मक़तल को भी मय-ख़ाना कहा जाए

जो बात कही जाए वो तेवर से कही जाए
जो शेर कहा जाए हरीफ़ाना कहा जाए

हर होंट को मुरझाया हुआ फूल समझीए
हर आँख को छलका हुआ पैमाना कहा जाए

सुनसान हुए जाते हैं ख़्वाबों के जज़ीरे
ख़्वाबों के जज़ीरों को भी वीराना कहा जाए

वाइज़ ने जो फ़रमाया था मेहराब-ए-हरम में
रिन्दों से वो क्यूँ साक़ी-ए-मय-ख़ाना कहा जाए

तपते हुए सहरा में भी कुछ फूल खिलाएँ
कब तक लब ओ रूख़सार का अफ़साना कहा जाए

हम सुब्ह-ए-बहाराँ की तमाज़त से जले हैं
हम से गुल ओ शबनम का न अफ़साना कहा जाए

दीवाना हर इक हाल में दीवाना रहेगा
फ़रज़ाना कहा जाए के दीवाना कहा जाए

मख़दूम से हम को भी निस्बत वहीं ‘मंजूर’
रिन्दों में जिसे निस्बत-ए-पैमाना कहा जाए

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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2 responses to “अब ख़ून को मय!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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