आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि तथा नवगीत के प्रमुख हस्ताक्षर स्वर्गीय माहेश्वर तिवारी जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।
माहेश्वर जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।
आज प्रस्तुत है स्वर्गीय माहेश्वर तिवारी जी का यह नवगीत-

कहती है दूब
हँसो भाई पेड़
बाहर जितना देखते हो
धरती में
धसों भाई पेड़ ।
जड़ें बहुत गहरे ले जाओ
यहाँ वहाँ उनको फैलाओ
चील की तरह बाँहों पंजों में
आंधी को
कसो भाई पेड़ ।
चील किसे देती है सोचो
आसमान गुर्राए तो नोचो
गीत की तरह हरियाली पहनो
जन-जन में
बसो भाई पेड़ ।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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