वो ख़्वाब थे जिन्हें हम!

वो ख़्वाब थे जिन्हें हम मिल के देख सकते थे,
ये बार-ए-ज़ीस्त है तन्हा उठाना पड़ता है|

वसीम बरेलवी

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