
देश वही है, काल वही है कालू नहीं रहा
मानवता का हाल वही है कालू नही रहा।
जब तक था जीवन , घर भर में फिरता रहता था,
दिखता कम था पर अनुभव से तिरता रहता था,
थी पहचान उसे इस घर के कोने कोने की
भोजन स्थल की और खास कर निजी बिछौने की,
किसी एक कोने में घर के, चिंतन मुद्रा में
उसका वह अभ्यास मनन का चालू नहीं रहा।
किसके लिए जिया वह आखिर अनथक साध लिए
भोली भाली उन आंखों में प्रीति अगाध लिए
नहीं अकेला रहने वह दुनिया में आया था
गोल गोल आंखों में कातरता भर लाया था,
गिरा एक क्षण चलते चलते, बस फिर नहीं उठा
कैसे वह लाडला सभी का भालू नहीं रहा।
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