गीत-आघात!

आज मैं अपनी तरह के अनूठे हिंदी कवि स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।

भवानी दादा जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की यह कविता –

तोड़ रहे हैं
सुबह की ठंडी हवा को
फूट रही सूरज की किरनें

और
नन्हें-नन्हें
पंछियों के गीत

मज़दूरों की
काम पर निकली टोलियों को
किरनों से भी ज़्यादा सहारा
गीतों का है शायद

नहीं तो
कैसे निकलते वे
इतनी ठंडी हवा में !

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********

2 responses to “गीत-आघात!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

    Liked by 1 person

    1. नमस्कार जी

      Like

Leave a comment