मेह की झड़ी लगी!

आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय बालकृष्ण शर्मा नवीन जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।

नवीन जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय बालकृष्ण शर्मा नवीन जी की यह कविता –

मेह की झड़ी लगी नेह की घड़ी लगी।
हहर उठा विजन पवन,
सुन अश्रुत आमंत्रण,
डोला वह यों उन्मन,
ज्यों अधीर स्नेही मन,
पावस के गीत जगे, गीत की कड़ी जगी।

तड़-तड़-तड़ तड़ित चमक-
दिशि-दिशि भर रही दमक,
घन-गर्जन गूँज-गमक –
जल-धारा झूम-झमक,
भर रही विषाद हिये चकित कल्पना-खगी।

ध्यान-मग्न नीलांबर,
ओढ़े बादर-चादर,
अर्घ्य दे रहा सादर-
जल-सागर पर गागर,
भक्ति-नीर, सिक्त भूमि-स्नेह सर्जना पगी,

अंबर से भूतल तक
तुमको खोजा अपलक,
क्यों न मिले अब तक?
ओ, मेरे अलख-झलक!
बुद्धि मलिन, प्राण चकित, व्यंजना ठगी-ठगी,
मेह की झड़ी लगी नेह की घड़ी लगी।

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********

Leave a comment