समझौता कहाँ हुआ!

आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय बलबीर सिंह रंग जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।

रंग जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय बलबीर सिंह रंग जी का यह गीत –

समझौता कहाँ हुआ?
प्यास और पानी का,
भक्त और ज्ञानी का;
सतही सम्वेदन ने
मर्मस्थल कहाँ छुआ?
समझौता कहाँ हुआ?

आँखों का सपनों से,
गैरों का अपनों से;
अमृत-पान करके राहु,
इकलौता कहाँ हुआ?
समझौता कहाँ हुआ?

कंचन का माटी से,
शृंगों का घाटी से;
ऋषियों का द्रोपदी के घर,
न्यौता कहाँ हुआ?
समझौता कहाँ हुआ?

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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