आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।
मिश्र जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का यह नवगीत –

जहाँ गिरा है लाल पसीना ।
वह काशी है, वही मदीना ।
नाम देश का भले और हो
वह भारत है, ताने सीना ।
अनपढ़ और गंवार भले था
गिरमिटिया लोगों का जत्था
तुलसी के रामजी साथ थे
फिर क्यों समझें उन्हें निहत्था ।
जहाँ गए हम, नई भूमि पर
नए सिरे से सीखा जीना ।
छोटा है भूगोल भले ही
भारत का इतिहास बड़ा है
नहीं तख़्त के लिए आज तक
हमने सच के लिए लड़ा है ।
धोखा बार-बार खाया पर
नहीं किसी का है हक़ छीना ।
हम तो अमरबेल हैं, केवल
साँस ले सकें, इतना काफ़ी
खाली हाथ न लौटे साधू —
श्वान द्वार से, इतना काफ़ी ।
कभी नहीं आराम लिखा है
सावन हो या जेठ महीना ।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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