ख़ुद को हम ढूँडने निकलें!

हम वो गुम-गश्त-ए-मोहब्बत हैं कि तुम तो क्या हो,
ख़ुद को हम ढूँडने निकलें तो ज़माने लग जाएँ|

महशर आफ़रीदी

2 responses to “ख़ुद को हम ढूँडने निकलें!”

  1. वाह वाह।

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    1. धन्यवाद जी

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