स्त्रियाँ लाती थीं मीलों दूर से भरकर घड़े!

आज एक बार फिर मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि प्रयाग शुक्ल जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।

प्रयाग शुक्ल जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।

लीजिए आज प्रस्तुत है प्रयाग शुक्ल जी की यह कविता –

खड़े थे कई बच्चे
तितर-बितर।
नहीं था पानी
बिजली नहीं थी।
कीचड़ था।

आंधी चलती थी।
बूंदें गिरती थीं।
रोती थीं कविता
की दुनिया में-
रात की नदियाँ।

घोंसले बनते थे
उजड़ते थे-

स्त्रियाँ लाती थीं
मीलों दूर से
भरकर घड़े।

बच्चियाँ मांजती थीं
सुबह से रात तक
बर्तन
दूसरों के।

आती-जाती थीं ट्रेनें।

नीम और पीपल थे-
कहानियाँ थीं
उनकी हज़ारों-हज़ार।

कोहराम थे।
खोए जाते थे
माता-पिता।

बैठे थे
गुमशुदा बच्चे,
चुपचाप।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********

4 responses to “स्त्रियाँ लाती थीं मीलों दूर से भरकर घड़े!”

  1. बहुत सुंदर।

    Liked by 3 people

    1. हार्दिक आभार जी

      Liked by 1 person

  2. नमस्कार 🙏🏻

    Liked by 2 people

    1. नमस्कार जी

      Liked by 1 person

Leave a comment