आज एक बार फिर मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय नरेंद्र शर्मा जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।
नरेंद्र शर्मा जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय नरेंद्र शर्मा जी की यह कविता –

भरे जंगल के बीचो बीच,
न कोई आया गया जहाँ,
चलो, हम दोनों चलें वहाँ ।
जहाँ दिन भर महुआ पर झूल,
रात को चू पड़ते हैं फूल,
बाँस के झुरमुट में चुपचाप,
जहाँ सोए नदियों के कूल;
हरे जंगल के बीचो – बीच,
न कोई आया गया जहाँ,
चलो, हम दोनों चलें वहाँ।
विहग – मृग का ही जहाँ निवास,
जहाँ अपने धरती, आकाश,
प्रकृति का हो हर कोई दास,
न हो पर इसका कुछ आभास,
खरे जंगल के बीचो – बीच,
न कोई आया गया जहाँ,
चलो, हम दोनों चलें वहाँ ।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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