आज मेरे वरिष्ठ कवि मित्र रहे श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय नवीन सागर जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।
नवीन जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय नवीन सागर जी की यह कविता –

इतने बजे का आकाश
इतने सालों से नहीं देखा
आए
सड़कों के जाले मे घूमते-घूमते
लड़खड़ाए
और कहीं भी गिर पड़े.
उठने का समय हुआ
दु-स्वप्न
अंधकार सा लिपटा चला
चेहरा झर गया
इतने सालों के आईने में
पीली मद्धिम रोशनी में
धुएं और विदाई की धुंध है
बहुत बड़े नरक का शोर
आवाज के भीतर
पछाड़े मारता है जब हम
विश्वास दिलाते हैं
और थपथपाते हैं हाथ
संसार की दरारों से
देखते हैं पुरखे
कि चित्रकार
भुरभुरे कैनवस में धसकता
अपना चित्र देखता हो.
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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