उसने मेरे बेगानेपन को ही!

आज श्रेष्ठ हिंदी कवि श्री नचिकेता जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।

इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री नचिकेता जी का यह नवगीत –

उसने मेरे
बेगानेपन को ही
छेड़ दिया
घनी उमस में
कभी न उसने
पंखा हाँका है
लसिया गए भात को
देसी घी से छौंका है
दूध मुँहे पाड़े को
माँ से दूर खदेड़ दिया
उसने
नागफनी के जंगल में
कीकर बोया
ख़ुशबू नहीं, चुभन काँटों की
मंज़िल हो गोया
उभर रहे
स्वेटर का पूरा ऊन
उधेड़ दिया
हरियाली केलिए
पेड़ के
हरे तने काटे
बड़े प्यार से पास बुलाकर
जड़े कई चाँटे
उपजाऊ धरती के
बँटवारे का
मेड़ दिया


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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2 responses to “उसने मेरे बेगानेपन को ही!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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