दीदी के धूल भरे पाँव!

आज फिर से मैं विख्यात हिंदी साहित्यकार, संपादक और कवि स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।

भारती जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी की यह कविता–


दीदी के धूल भरे पाँव
बरसों के बाद आज
फिर यह मन लौटा है क्यों अपने गाँव;

अगहन की कोहरीली भोर:
हाय कहीं अब तक क्यों
दूख दूख जाती है मन की कोर!

एक लाख मोती, दो लाख जवाहर
वाला, यह झिलमिल करता महानगर
होते ही शाम कहाँ जाने बुझ जाता है-
उग आता है मन में
जाने कब का छूटा एक पुराना गँवई का कच्चा घर

जब जीवन में केवल इतना ही सच था:
कोकाबेली की लड़, इमली की छाँव!

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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