छंद प्रसंग नहीं हैं!

आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि और हिंदी नवगीत के शिखर पुरुष स्वर्गीय देवेंद्र शर्मा इंद्र जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।

इंद्र जी की स्नेह पाने का भी मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ था, मैंने उनकी अधिक रचनाएं शेयर नहीं की हैं।

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय देवेंद्र शर्मा इंद्र जी का यह नवगीत–

हम जीवन के महाकाव्य हैं
केवल छंद प्रसंग नहीं हैं।
कंकड़-पत्थर की धरती है
अपने तो पाँवों के नीचे
हम कब कहते बन्धु! बिछाओ
स्वागत में मखमली गलीचे
रेती पर जो चित्र बनाती
ऐसी रंग-तरंग नहीं है।

तुमको रास नहीं आ पायी
क्यों अजातशत्रुता हमारी
छिप-छिपकर जो करते रहते
शीतयुद्ध की तुम तैयारी
हम भाड़े के सैनिक लेकर
लड़ते कोई जंग नहीं हैं।

कहते-कहते हमें मसीहा
तुम लटका देते सलीब पर
हंसें तुम्हारी कूटनीति पर
कुढ़ें या कि अपने नसीब पर
भीतर-भीतर से जो पोले
हम वे ढोल-मृदंग नहीं है।


तुम सामूहिक बहिष्कार की
मित्र! भले योजना बनाओ
जहाँ-जहाँ पर लिखा हुआ है
नाम हमारा, उसे मिटाओ
जिसकी डोर हाथ तुम्हारे
हम वह कटी पतंग नहीं है।

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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