आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि श्री उद्भ्रांत जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।
उद्भ्रांत जी की रचनाएं शायद मैंने पहले शेयर नहीं की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री उद्भ्रांत जी का यह नवगीत –

सूर्य ने पुकारा
कल मेरी आकृति को सूर्य ने पुकारा
उजली उजली किरणें
चेहरे से फूटीं
स्वर के बन्दीगृह की
दीवारें टूटीं
शब्द ने पुकारा
कल मेरी संस्कृति को शब्द ने पुकारा
एक और ’मैं’ मेरे
भीतर से उभरा
’मेरापन’ जीवन के
हर पल पर बिखरा
बिम्ब ने पुकारा
कल मेरी प्रतिकृति को बिम्ब ने पुकारा
धड़कन में रागों की
मदिर सृष्टि डोली
सांस-सांस में, सरगम
की माया बोली
छन्द ने पुकारा
कल मेरी झंकृति को छन्द ने पुकारा
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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