आज एक बार फिर मैं श्रेष्ठ हिंदी नवगीतकार स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।
मालवीय जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी का यह नवगीत–

दिन यों ही बीत गया !
अञ्जुरी में भरा-भरा जल जैसे रीत गया ।
सुबह हुई
तो प्राची ने डाले डोरे
शाम हुई पता चला
थे वादे कोरे
गोधूलि, लौटते पखेरू संगीत गया ।
दिन यों ही बीत गया !
रौशन
बुझती-बुझती शक्लों से ऊबा
एक चाय का प्याला
एक सूर्य डूबा
साँझ को अन्धेरा फिर एक बार जीत गया ।
दिन यों ही बीत गया !
आज का अपेक्षित सब
फिर कल पर टाला
उदासियाँ मकड़ी-सी
तान रहीं जाला
तज कर नेपथ्य कहाँ, बाउल का गीत गया ।
दिन यों ही बीत गया !
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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