आज एक बार फिर मैं वरिष्ठ हिंदी नवगीतकार श्री नचिकेता जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।
नचिकेता जी की कुछ ही रचनाएं मैंने पहले शेयर की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री नचिकेता जी का यह नवगीत–

गिरे ताड़ से
मगर बीच में ही
खजूर पर हम अँटके।
घर की झोल लगी दीवारों पर हैं
चमगादड़ लटके
खूस गए हैं काठ
धरन, ओलती, दरवाज़े,चौखट के
और न जीवित रहे
याद में गीत
पनघट के।
साँप सूंघ जाने के कारण हम लगते
माहुर-माते
उखड़ रही साँसों से
कैसे आँखों की उलटन जातें
नागफनी के जंगल में
उम्मीदों के
बादुर भटके।
पूरी नींद न हम सो पाते
अब तक
मिले दिलासे से
जब तक सोने बदले
गए यहाँ हैं पीतल-काँसे से
पानी कहाँ रखे हम
पेंदी तक हैं
चिसक गए मटके।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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