देवता की याचना!

आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय केदारनाथ मिश्र प्रभात जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।
इनकी अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय केदारनाथ मिश्र प्रभात जी का यह गीत–

इतना विस्तृत आकाश-अकेला मैं हूँ
तुम अपने सपनों का अधिवास मुझे दो।

नीला-नीला विस्तार, हिलोरों में यों ही बहता हूँ
सूनी-सूनी झंकार, न जाने क्यों उदास रहता हूँ
यह अमृत चाँद का तनिक न अच्छा लगता
प्रिय! तुम अपनी रसवंती प्यास मुझे दो।

कण-कण में चारों ओर छलकती नृत्य-चपल मधुबेला
झूमे-बेसुध सौंदर्य, लगा है मधुर रूप का मेला
ऐसी घडियों का व्यंग न सह पाता हूँ
तुम अपने प्राणों का उच्छ्वास मुझे दो।

नंदन के चंदन से शीतल छंदों की क्यारी-क्यारी
सब कुछ देती, देती न मुझे मैं चाँ जो चिनगारी
रम जाऊँ मैं जिसके अक्षर-अक्षर में
वह गीली पलकों का इतिहास मुझे दो।

यह देश तुम्हारे लिए बसाया मैंने सुघर-सलोना
कोमल पत्तों के बीच जहाँ ओसों का चाँदी-सोना
उतरूँगा सुख से मैं अंकुर-अंकुर में
तृण-तरु में मिलने का विश्वास मुझे दो।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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4 responses to “देवता की याचना!”

  1. बहुत सुंदर।

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    1. हार्दिक धन्यवाद जी

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  2. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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