आज एक बार फिर मैं श्रेष्ठ हास्य कवि स्वर्गीय अल्हड़ बीकानेरी जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।
अल्हड़ जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय अल्हड़ बीकानेरी जी की यह हास्य ग़ज़ल –

हफ़्तों उनसे मिले हो गए,
विरह में पिलपिले हो गए।
सदके जूड़ों की ऊँचाईयाँ,
सर कई मंजिलें हो गए।
डाकिए से ‘लव’ उनका हुआ,
खत हमारे ‘डिले’ हो गए।
परसों शादी हुई, कल तलाक,
क्या अजब सिलसिले हो गए।
उनके वादों के ऊँचे महल,
क्या हवाई किले हो गए।
नौकरी रेडियो की मिली,
गीत उनके ‘रिले’ हो गए।
हाशिये पर छपी जब ग़ज़ल,
दूर शिकवे-गिले हो गए।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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